‘‘तू मूर्ख है क्या ? यही तो वक्त है। तू नहीं गया तो माना जाएगा तू नपुंसक है, भ्रष्टाचार का समर्थक है।’’
‘‘अच्छा ! तू दो घण्टे वहां बैठ जाएगा तो तू भ्रष्टाचार का विरोधी हो जाएगा ? मैं क्या जानता नहीं तुझे ? अच्छा ये बता जितने लोग जुट रहे हैं उतने वाकई भ्रष्टाचार के विरोधी होते तो क्या किसी आंदोलन की ज़रुरत भी पड़ती ? ’’
‘‘तू यार फ़ालतू के तर्क करता है, करता-धरता कुछ है नहीं। समझ ले कनाट प्लेस जा रहा है घूमने। दो-तीन घण्टे नहीं निकाल सकता ? बड़े-बड़े नेता-अभिनेता आ रहे हैं, कोई बात तो होगी !’’
‘‘बात जितनी है उतनी मुझे पता है। तेरी तरह नहीं हूं। आने वालों को बख़ूबी पता है कि जंतर-मंतर कोई जलियांवाला बाग़ नहीं है और इस वक्त वहां होने में शायद कोई फ़ायदा हो तो हो रिस्क तो बिलकुल भी नहीं है। वहां जाने के नाम पर ख़ुदको शहीद मत समझ।’’
‘‘साले, हर दल के नेता, हर तरह के व्यापारी समर्थन कर रहे हैं।’’
‘‘क्या नयी बात है ? स्वाभाविक है। तू तो हर शादी में फोटो खिंचाने को आगे-आगे भागता है। बेटा, भ्रष्टाचार के विरोध में अगर सारे भ्रष्टाचारी फ़टाफ़ट जाकर तख़्त पर आगे-आगे बैठ जाते हैं तो यह भी उनके भ्रष्टाचार का ही विस्तार है। ’’
‘‘ऐसी-तैसी करा। वैसे करना क्या है आज तुझे ?’’
‘‘बैंक की पेटी में चैक डाला था, खो गया। उसका पता करना है। एक उद्योगपति जिसे भरत-रत्न मिलने की पूरी उम्मीद है, की कंपनी ने मेरी सिक्योरिटी मार ली है। उसपर केस डाला है, वहां जाना है। एक कोरियर वाले ने पैसे ज़्यादा लेकर भी कोरियर नहीं पहुंचाया, वहां जाना है। एक पड़ोसी जो शायद तुझे वहीं बैठा मिलेगा, मेरे कोर्टयार्ड के बराबर में नाजायज़ कमरा बना रहा है, उस सिलसिले में वकील के पास जाना है, एक संपादक ने स्वीकृत रचना तीन साल बाद लौटा दी, उससे बात करनी है, एक बिना मीटर के पड़ोसी ने तार हमारे कनेक्शन में डाल दिया था, उसके पैसे हमारे बिल में लगकर आ गए, उसका निपटारा कराना है, जल विभाग ने बिल में हज़ार रुपए ज़्यादा लगाके भेज दिए हैं वहां जाना है, प्रोपर्टी टैक्स का झूठा नोटिस आया हुआ है वहां जाना है........’’
‘‘हो सकता है ये सब तुझे वहीं बैठे मिल जाएं!’’
‘‘वहां नहीं तो और कहां मिलेंगे !’’
‘‘ओ बस कर यार ! यही करता रहता है कि कुछ काम भी करता है ?
‘‘यही करता हूं। काम तू कर ना। जाके दर्ज़ हो इतिहास में, तुझे क्या रोक रहा हूं ? ’’
‘‘तू भी यही करता रह। पर एक बात बता दूं, इतिहास में कभी दर्ज़ नहीं हो पाएगा।’’
‘‘अरे, मेरे पास टाइम नहीं दर्ज होने का। तू जा ना। एक बात बता, कोई सारी ज़िंदगी भ्रष्टाचार से लड़ता रहा हो पर वो इस आंदोलन में न जा पाए, तो क्या उसका सारा किया-धरा, अनकिया हो जाएगा !?’’
‘‘फिर वही बेवकूफ़ी की बातें!’’
‘‘मैं तो ऐसी ही बातें करता हूं, तू निकलता क्यों नहीं !?’’
‘‘हां, ठीक है, जाता हूं।’’
‘‘ठीक है!’’
‘‘ठीक है तो ठीक है।’’
-संजय ग्रोवर
अंत में एक प्रश्न और: एक अखबार वाले मित्र ने सामयिक व्यंग्य मांगे थे। शनिवार को उन्हें यह भेजा तो उन्होंने बताया कि सोम या मंगल को छप जाएगा। आज दोपहर को मेल करके पूछा क्या हुआ तो अभी तक जवाब नहीं आया। हो सकता है कि वे मित्र किसी परेशानी में हों या मुझमें धैर्य की कमी हो।
उनके पास मेरा फ़ोन नंबर है, मेरे पास उनका नहीं है।
फिर भी आपको क्या लगता है, वे मित्र भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समर्थक होंगे या विरोधी !?
‘‘अच्छा ! तू दो घण्टे वहां बैठ जाएगा तो तू भ्रष्टाचार का विरोधी हो जाएगा ? मैं क्या जानता नहीं तुझे ? अच्छा ये बता जितने लोग जुट रहे हैं उतने वाकई भ्रष्टाचार के विरोधी होते तो क्या किसी आंदोलन की ज़रुरत भी पड़ती ? ’’
‘‘तू यार फ़ालतू के तर्क करता है, करता-धरता कुछ है नहीं। समझ ले कनाट प्लेस जा रहा है घूमने। दो-तीन घण्टे नहीं निकाल सकता ? बड़े-बड़े नेता-अभिनेता आ रहे हैं, कोई बात तो होगी !’’
‘‘बात जितनी है उतनी मुझे पता है। तेरी तरह नहीं हूं। आने वालों को बख़ूबी पता है कि जंतर-मंतर कोई जलियांवाला बाग़ नहीं है और इस वक्त वहां होने में शायद कोई फ़ायदा हो तो हो रिस्क तो बिलकुल भी नहीं है। वहां जाने के नाम पर ख़ुदको शहीद मत समझ।’’
‘‘साले, हर दल के नेता, हर तरह के व्यापारी समर्थन कर रहे हैं।’’
‘‘क्या नयी बात है ? स्वाभाविक है। तू तो हर शादी में फोटो खिंचाने को आगे-आगे भागता है। बेटा, भ्रष्टाचार के विरोध में अगर सारे भ्रष्टाचारी फ़टाफ़ट जाकर तख़्त पर आगे-आगे बैठ जाते हैं तो यह भी उनके भ्रष्टाचार का ही विस्तार है। ’’
‘‘ऐसी-तैसी करा। वैसे करना क्या है आज तुझे ?’’
‘‘बैंक की पेटी में चैक डाला था, खो गया। उसका पता करना है। एक उद्योगपति जिसे भरत-रत्न मिलने की पूरी उम्मीद है, की कंपनी ने मेरी सिक्योरिटी मार ली है। उसपर केस डाला है, वहां जाना है। एक कोरियर वाले ने पैसे ज़्यादा लेकर भी कोरियर नहीं पहुंचाया, वहां जाना है। एक पड़ोसी जो शायद तुझे वहीं बैठा मिलेगा, मेरे कोर्टयार्ड के बराबर में नाजायज़ कमरा बना रहा है, उस सिलसिले में वकील के पास जाना है, एक संपादक ने स्वीकृत रचना तीन साल बाद लौटा दी, उससे बात करनी है, एक बिना मीटर के पड़ोसी ने तार हमारे कनेक्शन में डाल दिया था, उसके पैसे हमारे बिल में लगकर आ गए, उसका निपटारा कराना है, जल विभाग ने बिल में हज़ार रुपए ज़्यादा लगाके भेज दिए हैं वहां जाना है, प्रोपर्टी टैक्स का झूठा नोटिस आया हुआ है वहां जाना है........’’
‘‘हो सकता है ये सब तुझे वहीं बैठे मिल जाएं!’’
‘‘वहां नहीं तो और कहां मिलेंगे !’’
‘‘ओ बस कर यार ! यही करता रहता है कि कुछ काम भी करता है ?
‘‘यही करता हूं। काम तू कर ना। जाके दर्ज़ हो इतिहास में, तुझे क्या रोक रहा हूं ? ’’
‘‘तू भी यही करता रह। पर एक बात बता दूं, इतिहास में कभी दर्ज़ नहीं हो पाएगा।’’
‘‘अरे, मेरे पास टाइम नहीं दर्ज होने का। तू जा ना। एक बात बता, कोई सारी ज़िंदगी भ्रष्टाचार से लड़ता रहा हो पर वो इस आंदोलन में न जा पाए, तो क्या उसका सारा किया-धरा, अनकिया हो जाएगा !?’’
‘‘फिर वही बेवकूफ़ी की बातें!’’
‘‘मैं तो ऐसी ही बातें करता हूं, तू निकलता क्यों नहीं !?’’
‘‘हां, ठीक है, जाता हूं।’’
‘‘ठीक है!’’
‘‘ठीक है तो ठीक है।’’
-संजय ग्रोवर
अंत में एक प्रश्न और: एक अखबार वाले मित्र ने सामयिक व्यंग्य मांगे थे। शनिवार को उन्हें यह भेजा तो उन्होंने बताया कि सोम या मंगल को छप जाएगा। आज दोपहर को मेल करके पूछा क्या हुआ तो अभी तक जवाब नहीं आया। हो सकता है कि वे मित्र किसी परेशानी में हों या मुझमें धैर्य की कमी हो।
उनके पास मेरा फ़ोन नंबर है, मेरे पास उनका नहीं है।
फिर भी आपको क्या लगता है, वे मित्र भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समर्थक होंगे या विरोधी !?
